कौन हैं खाटू श्याम जी
अंतिम अपडेट: 4 अक्टूबर 2026
खाटू श्याम जी को हारे का सहारा कहा जाता है। मान्यता है कि वे महाभारत के वीर बर्बरीक हैं, जिन्होंने श्रीकृष्ण को अपना शीश दान किया और कलियुग में "श्याम" नाम से पूजे जाने का वरदान पाया।
ध्यान दें: बर्बरीक की कथा महाभारत के मूल पाठ में नहीं मिलती; यह स्कन्द पुराण और लोक-परम्पराओं में आती है, और अलग-अलग क्षेत्रों में इसके रूप थोड़े भिन्न हैं। यहाँ प्रचलित परम्परा संक्षेप में दी गई है।
परिवार
- पिता: घटोत्कच (भीम और हिडिम्बा के पुत्र)
- माता: मौरवी (मोरवी) — दैत्य राजा मूर की पुत्री; कुछ कथाओं में अहिलावती/कामकंटका नाम भी मिलता है
- दादा: भीम, दादी: हिडिम्बा; इस प्रकार पाण्डव उनके पितामह-परिवार के हैं
- कुछ ग्रन्थों में उनके भाइयों के नाम अंजनपर्व और मेघवर्ण बताए गए हैं
कथा — संक्षेप में
शिक्षा और वरदान। बर्बरीक ने युद्ध-कला अपनी माता से सीखी। देवी (सिद्ध अम्बिका/दुर्गा) की उपासना से उन्हें तीन अमोघ बाण मिले — इसीलिए वे तीन बाणधारी कहलाए। माता ने उनसे वचन लिया कि वे सदा हारने वाले पक्ष का साथ देंगे।
कुरुक्षेत्र की ओर। महाभारत युद्ध की खबर सुनकर वे नीले घोड़े पर निकले (इसीलिए लीले के असवार)। रास्ते में ब्राह्मण वेश में श्रीकृष्ण ने उनकी परीक्षा ली — पूछा कि वे कितने समय में युद्ध समाप्त कर सकते हैं। बर्बरीक ने कहा कि एक ही क्षण में, तीन बाणों से।
पीपल के पत्तों की परीक्षा। कृष्ण ने उन्हें एक पीपल के सारे पत्तों को भेदने को कहा। बाण ने सब पत्ते बेध दिए, पर कृष्ण ने चुपके से एक पत्ता अपने पैर के नीचे दबा रखा था — बाण उनके पैर के चारों ओर घूमने लगा।
वचन की उलझन। कृष्ण ने समझ लिया कि बर्बरीक जिस ओर लड़ेंगे उसका विपरीत पक्ष कमज़ोर पड़ेगा और फिर उसकी ओर जाने से वे दोनों पक्षों का संहार कर देंगे। इसलिए उन्होंने दान माँगा।
श्रीकृष्ण ने दान में माँगा — उनका शीश। बर्बरीक ने बिना झिझक अपना शीश अर्पित कर दिया।
शीश के दानी। बर्बरीक ने युद्ध देखने की इच्छा जताई। कृष्ण ने उनका शीश एक ऊँचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहाँ से उन्होंने पूरा युद्ध देखा। युद्ध के बाद जब पाण्डव अपनी विजय का श्रेय आपस में बाँट रहे थे, तब शीश ने कहा कि विजय सिर्फ़ श्रीकृष्ण की नीति और सुदर्शन चक्र से हुई।
कृष्ण का वरदान। प्रसन्न होकर कृष्ण ने कहा कि कलियुग में तुम मेरे नाम "श्याम" से पूजे जाओगे और जो भी हारा हुआ तुम्हारी शरण आएगा, उसे सहारा मिलेगा।
खाटू से सम्बन्ध
परम्परा के अनुसार शीश राजस्थान के खाटू (तब खाटवांग) में प्रकट हुआ। कथा है कि वहाँ एक गाय अपने आप दूध देने लगी, खुदाई पर शीश मिला, और 1027 ई. में रूप सिंह चौहान को स्वप्न-आदेश पर मंदिर बना। आज वही स्थान श्री खाटू श्याम जी का मूल धाम है। देखें मुख्य धाम और कैसे पहुँचें।
श्रीकृष्ण और महाभारत से सम्बन्ध
- श्रीकृष्ण: इन्होंने ही शीश का दान लिया, "श्याम" नाम दिया और कलियुग में पूजे जाने का वरदान दिया। इसीलिए श्याम बाबा को कृष्ण का ही स्वरूप-नाम माना जाता है।
- पाण्डव: पितामह भीम के पौत्र होने से पाण्डव कुल से सीधा नाता।
- सन्देश: सत्य, वचन और त्याग — और जो हार रहा हो उसके साथ खड़े होने का प्रण।
बाबा श्याम के नाम
उत्सव
फाल्गुन शुक्ल एकादशी–द्वादशी (मेला) और कार्तिक एकादशी (देवउठनी) प्रमुख हैं। हर महीने की एकादशी पर भी भक्त विशेष दर्शन को आते हैं। तारीख़ें पंचांग कैलेंडर में देखें।
आस्था से जुड़ी इस जानकारी में कथा-रूप भिन्न हो सकते हैं; मंदिर की परम्परा के लिए आधिकारिक वेबसाइट देखें।